29 जनवरी, 2008

समाजवाद का अंत

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में कहा गया है कि संविधान की प्रस्तावना में आया शब्द समाजवाद मौलिक अधिकारों का हनन है। कहा गया कि संविधान की मूल प्रस्तावना में समाजवाद का ज़िक्र नहीं था। दलील ये दी जा रही है कि इसके कारण उन राजनीतिक पार्टियों को भी समाजवाद के प्रति निष्ठा जतानी पड़ती है, जो इसे सही नहीं मानते।
देखा जाए तो ये बहस नई नहीं है। आपातकाल के दौरान 1976 में 42वें संशोधन के ज़रिए संविधान की प्रस्तावना में ये शब्द जोड़ा गया। हालांकि उस समय इसका कोई विरोध नहीं हुआ। सराकर भी ऐसे फैसले ले रही थी जो कहीं ना कहीं समाजवाद की अवधारणा को बल देता था। लेकिन क्या आज इस आर्थिक उदारीकरण की पूंजीवादी व्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।
कई लोग तो यहां तक कहते हैं कि अब तो ये बहस पुरानी पड़ चुकी है। पूरी दुनिया के साथ साथ हमने भी इस पूंजीवाद के साथ साथ जीना और 9 फीसदी से ज्यादा की गति के विकास करना भी सीख लिया है।
क्या सचमुच हमने इस उदारीकरण को आत्मसात कर लिया है। ये बड़ा सवाल है। पिछले दिनों प्रकाश करात और ज्योति बसु जैसे धुरंधर मार्क्सवादियों ने ये माना कि अब समाजवाद संभव नहीं हमें विकास के लिए पूंजी चाहिए चाहे वो देसी हो या विदेशी। सोचना इस सवाल पर है कि क्या अब कल्याणकारी राज्य का सपना भी पूंजी और तेज़ औद्योगिक विकास के ज़िम्मे है।

23 जनवरी, 2008

चारों खाने सेंसेक्स


ये पहला मौका था जब शेयर बाज़ार में अफरा तफरी मची, खुद वित्तमंत्री ने बयान दिया लेकिन फिर भी बाज़ार खुलते ही सेंसेक्स की गिरावट जारी रही। ऐसा ही हुआ 22 जनवरी को। घंटों के ही कारोबार में 2273 अंकों से ज्यादा की गिरावट। कारोबार रोक देना पड़ा। हालांकि ये कुल मिलाकर चौथा मौका था जब सरकार को शेयर बाज़ार को संभालने के लिए कारोबार रोकना पड़े। 21 और 22 जनवरी वो मनहूस तारीख बन गई जब सिर्फ दो कारोबारी दिन में 10 लाख करोड़ से ज्यादा का नुकसान देखा गया। 21 हज़ार से 19 हज़ार के बीच झूल रहा संवेदी सूचकांक एक झटके में 17 हजार से भी नीचे चला गया। जिसमें 16 लाख करोड़ रुपए तक हलाल हो गए। याद कीजिए17 अक्टूबर 2007 सुबह 10 बजे बाज़ार खुला और अगले 4 मिनट में ही सेंसेक्स रिकॉर्ड 1744 अंक तक गिर गया। कारोबार रोक देना पड़ा। देखते ही देखते दो दिनों में बाज़ार से 410 मिलियन डॉलर उड़न छू। पिछले 10 साल अगर सेंसेक्स के लिए फर्श से अर्श की कहानी है तो औंधे मुंह गिरने की दास्तान भी नई नहीं है। पिछले अगस्त को ही सेंसेक्स ने गिरने के रिकॉर्ड भी अपने नाम किए। 1 अगस्त 2007 को बंबई शेयर बाज़ार का संवेदी सूचकांक 615 अंकों तक गिर गया तो उसके 15 दिनों बाद ही 16 अगस्त को सेंसेक्स ने गोता लगाते हुए 643 अंकों की गिरावट दर्ज की।ये संकट दरअसल में वैश्विक संकट है। भारतीय और अमेरिकी पूंजी बाज़ार के साथ साथ एशियाई और यूरोपीय शेयर बाज़ारों में भी गिरावट आई है। एशियाई बाज़ारों की बात करें तो जापान में टोक्यो का निक्केई सूचकांक चीन का शंघाई सुचकांक में भी औसतन 7 से 8 फीसदी तक गिरे।

14 जनवरी, 2008

कहां है हमारा आसमां !


पिछले सात-आठ सालों में संसदीय कार्यवाही और उसकी जवाबदेही पर कई सवाल उठे हैं। नतीजा ये कि संसदीय कार्यवाही एक अलग से टीवी चैनल पर "लाईव" होने के बाद भी हम अक्सर कई फैसलों से बेपरवाह रहते हैं। ये वो फैसले हैं जो धीरे धीरे ही सही लेकिन मील का पत्थर का रुप ले लेते हैं। ये मील के पत्थर सालों के जनसंघर्ष का परिणाम होते हैं। ऐसा ही एक पत्थर क़ानून की शक्ल में पिछले 1 जनवरी से लागू हुआ। ये क़ानून उन साढ़े आठ करोड़ आदिवासियों को अपनी तरह से जीने का अधिकार देता है। ये क़ानून है Forest Tribal Act यानी आदिवासी वनाधिकार क़ानून।
जल, जंगल और ज़मीन पर हो किसका हक़। ये नारा बार उठता रहा है। वो वनवासी जो सालों से जंगलों के साथ साथ जीते रहे हैं। क्या अचानक ही उन्हें पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर उसी जंगल का दुश्मन बताया जा सकता है। यही वो बड़ा सवाल जिसने आदिवासी वनाधिकार क़ानून की भूमिका रची।
अनुसूचित जनजाति के करोड़ो लोग सालों से जंगलों में रहते हुए वहां के संसाधनों का इस्तेमाल करते आए हैं। ये संसाधन रोज काम आने वाली चीज़े हैं, मसलन दातुन या जलावन। लेकिन इसे अब तक कोई क़ानूनी जामा नहीं पहनाया जा सका था। क्योंकि इसके रास्ते में 1980 का जंगल संरक्षण क़ानून एक बड़ी बाधा थी। 1980 में बने इस क़ानून ने एक तरह से आदिवासियों के पूरे अस्तित्व को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था।
पिछली 1 जनवरी को आख़िरकार आदिवासी वनाधिकार क़ानून लागू कर दिया। इस कदम के बाद उन आदिवासियों को राहत मिलेगी जो 1 दिसंबर 2005 तक जंगलों की ज़मीनों पर रहते आए हैं। एक अनुमान के अनुसार इस क़ानून का फायदा लेने वालों की संख्या 1 करोड़ के आसपास है।
इस क़ानून के दायरे से 28 टाईगर रिज़र्व को बाहर रखा गया है। इससे इन टाईगर रिज़र्व में रहने वाले क़रीब 10 लाख जंगलवासियों को बेघर होना पड़ेगा। टाईगर लॉबी इस क़ानून के सख्त खिलाफ थी। उनका आरोप है कि पिछले सालों में आदिवासी पूरी तरह से बदल गए हैं। उनकी आबादी बढ़ रही है। नतीजा जंगलों और जानवरों को भारी नुकसान हो रहा है। जंगल से तस्करी में भी उनका एक बड़ा योगदान है।
एक तरफ ये कहा जा रहा था कि जंगलों और जानवरों को आदिवासियों से ही सबसे ज्यादा नुकसान होता है, जबकि सदियों से जंगलों में ही रहने वाले आदिवासी इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। लेकिन यहां ये भी याद रखना होगा कि देश के कई इलाकों में ये आदिवासी ही हैं जिन्होंने कई हद तक पर्यावरण संतुलन भी बनाए रखा है वो जंगल और जानवरों के पूजते तक हैं। याद कीजीए राजस्थान के बिशनोई समुदाय को जिसने काले हिरण के शिकार को लेकर एक आंदोलन ही खड़ा कर दिया और सलमान ख़ान को सज़ा भी हुई।