गुरुवार, १५ अक्तूबर २००९
शनिवार, २९ अगस्त २००९
जिन्ना ने कहा था...
मुस्लिम लीग के एक सम्मेलन में जिन्ना ने कहा...
...ज्यादातर ये पाया गया है कि उनके (हिंदुओं के) जो नायक हैं वे मुसलमानों के दुश्मन हैं...ऐसी दो कौमों को, जिनमें से एक अल्पसंख्यक है और दूसरा बहुसंख्यक, एक देश में बांध देने से असंतोष बढ़ेगा और उस देश के लिए बनाई जाने वाली सरकार का तानाबाना अंतत: टूट जाएगा।
[ अगस्त, 1944]
जिन्ना ने मुस्लिम छात्रों को संबोधित करते हुए कहा...
...पाकिस्तान बन जाने से हिंदू मुसलमान खुश होंगे, क्योंकि ये उनके हित में यहीं ठीक रहेगा। वे कभी भी किसी को भी, चाहे वह अफगान हो या पठान मनमानी नहीं करने देंगे, क्योंकि भारत भारतीयों के लिए है।
[11 अगस्त, 1947]
जिन्ना ने कहा...
...यदि पाकिस्तान विभिन्न देशों के अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अपनी कोई जगह बनाना चाहता है तो उसे संप्रदाय और मज़हब से ऊपर उठना होगा। आप आज़ाद हैं, आप अपने मंदिरों में जाने के लिए आज़ाद हैं। आप अपनी मस्ज़िदों या दूसरे पूजा स्थलों पर जाने को आज़ाद हैं। आप किसी भी मज़हब, जाति, नस्ल से ताल्लुक रखते हैं, सरकार के कामकाज से उसका कोई सरोकार नहीं होगा।
एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने जिन्ना के बारे में कहा...
...वे सच्चे गुणों से बने हैं और तमाम सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं, यह उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे अच्छा राजदूत बनाता है।
.......इन बयानों के ज़रिए मैं कोई विश्लेषण नहीं कर रहा। बल्कि, बहस को समझने की कोशिश कर रहा हूं और सबसे पूछ रहा हूं कि जो अस्पष्टता ये बयान पेश करते हैं वही क्या समस्या की जड़ है। जिन्ना सांप्रदायिक थे या धर्मनिरपेक्ष या कुछ और...आप क्या कहते हैं।
(जिन्ना के ऊपर लिखे बयान मैंने अलग अलग पत्रिकाओं से लिए हैं।)
शुक्रवार, २१ अगस्त २००९
"नाखून क्यों बढ़ते हैं"
गुरुवार, २० अगस्त २००९
अब किसकी बारी !
शुक्रवार, ३१ जुलाई २००९
बलुचिस्तान का सच!
--भाग एक-- दो साल पहले की बात है जब भारत के नौसेना प्रमुख ने बलुचिस्तान के ग्वादर में बन रहे बंदरगाह को लेकर एक बयान दिया। ये बयान था कि जिस तरह चीन इस बंदरगाह के निर्माण में मदद दे रहा है वो भारत के लिए रणनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण है। इसका सीधा अर्थ ये लगाया गया कि भारत को ये कतई ठीक नहीं लग रहा कि कराची के बाद पाकिस्तान एक और उसी तरह के बंदरगाह बनाने में लगा है। जिसमें चीन की एक बड़ी भूमिका है। यहां की स्थानीय बलूच आबादी भी इस बंदरगाह का भारी विरोध कर रही है। क्या भारत किसी तरह की रुची बलूचिस्तान में है। आज सवाल यही उठ रहा है। बलूचिस्तान से सीनेटर सनाउल्लाह बलूच का कहना था कि "हमसे ज्यादा तो परवेज़ मु्शर्रफ और इस्लामाबाद भारत के क़रीब हैं, हम तो काफी दूर हैं। हमारा संघर्ष हमारे लोगों का संघर्ष है। भारत के लिएो सबसे अच्छा मौका तो 1973 में था जब बलूचिस्तान की आज़ादी की मांग अपने चरम पर थी।" सवाल है कि भारत पर सवाल क्यों उठ रहे हैं। पाकिस्तान कहता है कि आफगानिस्तान में भारत के एक दर्जन से ज्यादा सूचना केंद्र हैं जो कई तरह के भ्रम फैला रहा है। नब्ज़ यहीं है। भारत की आफगानिस्तान में बढ़ती भूमिका को लेकर पाकिस्तान खुश नहीं। भारत ही ऐसा देश है जो आफगानिस्तान के विकास में न सिर्फ अपना पसीना और पैसा लगा रहा है बल्कि वो अपना ख़ून भी लगा रहा है। क्या ये भलमनसाहत हमेशा दूष्टता का शिकार होती रहेगी। पाकिस्तान क्यों नहीं अपने गिरेबानं में झांकता है। पंजाब और पंजाबी राजनीति के दबदबे ने बलूचों को कहीं का नहीं छोड़ा। आज ऊंगली भारत पर उठाना सुरॿित निकासी की तलाश तो नहीं। लेकिन, शर्म अल शेख की संयुक्त घोषणा पत्र परेशान तो करती है। लेकिन झूठ तो झूठ होता है। पाकिस्तान चिल्ला चिल्लाकर दावा कर रहा था कि बलुचिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर उसने भारत को डोज़ियर दिया है, लेकिन बाद में वो इससे नानुकूर करने लगा। बाद में अमेरिका के विशेष दूत रिचर्ड हाॅलब्रुक ने साफ किया कि ऐसा कोई डोज़ियर कभी दिया ही नहीं गया।...बाकि कहानी अगले पोस्ट में।
शनिवार, ६ जून २००९
ज्यादा खुश मत हों...
दलित महिला लोकसभा अध्यक्ष, महिला राष्ट्रपति और अल्पसंख्यक वर्ग से प्रधानमंत्री। क्या ये उपलब्धियां हमारे मज़बूत लोकतांत्रिक ढ़ांचे का परिणाम है? कई बार कोई भी इन तथ्यों के सामने खुश हो जाएगा, मैं भी खुश हूं। लेकिन, इन सबके पीछे छिपे बड़े सवाल परेशान करना नहीं छोड़ते। मैं वैयक्तिक रुप से मनमोहन सिंह का सम्मान करता हूं, लेकिन यहां बड़ा सवाल ये है कि क्या दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र को जनता का चुना हुआ प्रधानमंत्री नहीं मिल सकता? बिना कोई चुनाव जीते कोई इस देश में सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी तक पहुंच सकता है, तो ये लोकतंत्र की जीत से ज्यादा एक वफादार की वफादारी का सुफल है। एक बात साफ कर दूं कि मैं आडवाणी जी के कमज़ोर और मज़बूत की बहस में यकीन नहीं करता। महिला राष्ट्रपति की कहानी भी अलग नहीं, ये भी एक मास्टर स्ट्रोक की तरह आया था। हालांकि, हमारा संवैधानिक ढ़ांचा राष्ट्रपति के चयन में सत्ता पॿ का बोलबाला बताता है, लेकिन बात इसपर भी टिकी होती है कि किसे चुना जा रहा है? किसी की योग्यता पर सवाला नहीं, लेकिन सवाल नीयत का है। इसे कहीं से भी महिला सशक्तिक
रण समझने की भूल न करें। ये जादूई टोपी से निकले एक नाम की तरह था। महिला लोकसभा अध्यक्ष की तरफ आते हैं। फिर वही सवाल कि क्या पहले दलित और महिला स्पीकर के लिए हम देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी प्रमुख की जादूई टोपी से एक नाम निकलने के मोहताज हैं?अगर कोई दूसरा नाम निकल जाता तो। मीरा कुमार को इस कुर्सी पर क्या स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा ने पहुंचाया है, नहीं। इसके पीछे उनकी विरासत और वफादारी का पारितोषिक है। यहां भी मैं योग्यता की बात नहीं करता, ये मुद्दा आप लोगों पर छोड़ता हूं। क्या आपको लगता है कि ये तीनों शीर्ष पर बैठे सम्मानित व्यक्ति कभी भी किसी मुद्दे पर 10 जनपथ के आगे सोच पाएगें या बोल पाएगें? मंगलवार, २ जून २००९
मीडिया का फैशन !
पिछले दिनों एक हिंदी न्यूज़ चैनल पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का प्रवक्ता एंकर के सवालों को झेल रहा था। मुद्दा था अभिनेत्री रेखा को मिलने वाले एक पुरस्कार को लेकर मनसे का विरोध। मनसे का युवा प्रवक्ता किसी तरह अपने को सही साबित करने की कोशिश कर रहा था, तभी एंकर का दनदनाता सवाल आया कि आप क्यों रेखा के पीछे पड़े हैं महाराष्ट्र के विदर्भ जाकर आत्महत्या करने वाले किसानों के लिए कुछ क्यों नहीं करते। इससे पहले कि मनसे प्रवक्ता कोई जवाब दे पाता ब्रेक का समय हो चुका था। हालांकि पहली नज़र में मुझे एंकर का ये सवाल बिना संदर्भ का लगा लेकिन विदर्भ, किसानों की आत्महत्या, कालाहांडी में भूख मिटाने के लिए अपने दुधमुहे को बेचना। इस तरह की सामाजिक सरोकार वाले सवाल तथाकथित मुख्य धारा कि इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के लिए फैशन या कहें कि दिखावा बन गए हैं। क्योंकि ये टीआरपी दिला नहीं सकते। लेकिन क्या उस समाज में भी ये मुद्दा है या नहीं जहां से ये पैदा हुए हैं। आम चुनाव के सिलसिले में पिछले दिनों महाराष्ट्र के विदर्भ जाने का मौका मिला। इसी सामाजिक सरोकार का मारा मैं था सो बड़ा रोमांचित था कि उस इलाकें में स्टोरी की कोई कमी नहीं होगी जहां पिछले 4-5 सालों में साढ़े तीन हज़ार किसानों ने आत्महत्या की हो। अकोला, अमरावती, यवतमाल, बुलढाणा जैसे इलाकों के गांवों में गया किसानों की कहानियां ढूंढने, लेकिन आश्चर्य कि ये मुद्दा न तो चुनावों में था न ही लोगों के बीच। बुलढाणा के एक गांव चिखली गया जहां कई आत्महत्यायें हो चुकी थीं। मैंने कई
गांव वाले से पूछा कि आत्महत्या मुद्दा क्यों नहीं है। जवाब मिला कि सारे उम्मीदवार तो अपने हैं मरने वाले भी अपने ही हैं तो मुद्दा कैसे बने, क्या ज़रुरत है मुद्दा बनाने की एक लाख मुआवज़ा मिलना था मिल गया। जब इसका मतलब ढूंढा तो पता चला कि ये इलाका कुन्बी मराठा समुदाय का है, जहां दोनों मुख्य उम्मीदवार उसी समुदाय के हैं, ज्यादातर मतदाता उसी समुदाय के तो सब अपने ही हैं। यानी मुद्दा ख़त्म। मुद्दा नहीं तो स्टोरी कैसे करुं।
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