बुधवार, ३० दिसम्बर २००९

नया साल नई शुरुआत !

कल से तारिखों के कुछ हिस्से हमेशा के लिए बदल जाएगें।
1 जनवरी से नई शुरुआत करेगें।
क्या हम तुम फिर नए सिरे से बात करेगें।
इस बार ई मेल नहीं दिल से मिलेगें।
इस बार मोबाइल से नहीं, गले मिलेगें।
नौ-कड़ी (यानी नौकरी) की आपाधापी छोड़, जम कर पार्टी करेगें।
बैठकखाने में चर्चा छोड़, सड़कों पर उतरेगें।
जो ग़लत हो उसे ग़लत कहेगें।
नया साल नई शुरुआत बने सबको कहेगें।

शनिवार, २६ दिसम्बर २००९

अशोक उपाध्याय को मरना नहीं चाहिए था...

नाइट शिफ्ट में अशोक सर की मौत हो गई। ईटीवी में मेरे रहते शायद ही कभी उन्हें नाइट शिफ्ट में देखा हो। वो भी ईटीवी राजस्थान से जुड़े थे और मैं भी, लेकिन उनसे काफी जूनियर। उस शानदार व्यक्तित्व को आख़िर कौन भूल सकता है। वीओआई में वो नाइट शिफ्ट के इंचार्ज थे। मैंने ईटीवी 2004 के अगस्त महीने में ज्वाइन किया था और ईटीवी राजस्थान से जुड़ाव अक्टूबर, 2004 से हुआ हैदराबाद में ही। मैं ऐंकर था और अशोक सर भी उस दौरान मूल रुप से ऐंकरिंग ही कर रहे थे। शानदार ऐंकरिंग अपने उस ऐंकरिंग से शुरुआती दौर में उन्हें देखकर सोचता था कि आख़िर को कैसे बिना फम्बलिंग किए कैसे इतना स्मूद ऐंकरिंग कर सकता है। कहने की ज़रुरत नहीं कि काफी कुछ सीखा। अशोक उपाध्याय ईटीवी राजस्थान के डेस्क इंचार्ज थे और मैं नया नवेला एंकर। आज दिल में तुफान है उनके जाने से मन हो रहा है कि चिल्ला चिल्ला कर रोऊं। क्यों याद आ रहे हैं वो इतना। शायद इसलिए कि आज मैं जो हूं उसमें उनका एक बड़ा हाथ है। भूल नहीं सकता कि कैसे वो सपोर्ट करते थे, कैसे अपने महत्वपूर्ण बुलेटिन मुझसे जानबूझकर करवाते। चाहे चुनावी बुलेटिन हो या प्राइम टाइम बुलेटिन। काफी कम समय में मुझे काफी कुछ करने का मौकै मिला, अशोक सर ने बहुत किया। कभी कभी सोचता सर ऐसा क्यों करते हैं, क्या उनको अपना करियर आगे नहीं बढ़ाना। लेकिन, उनके चेहरे की निशचिंतता आश्वस्त करती। सारे सवालों को शांत कर देती। लेकिन के बुलेटन बनाने वाले लोगों पर कोफ्त होती कि कैसे लोग बुलेटिन बना रहे हैं। लेकिन जब अशोक सर बुलेटिन बनाते तो मज़ा आ जाता, लेकिन मैं जब होता तो वो बुलेटिन या तो ख़ुद अपना बनाया बुलेटिन पढ़ते या कोशिश में रहते कि मैं पढूं। लेकिन उनका बुलेटिन पढ़ना आसान भी नहीं होता था। साथ ही ये टेंशन कि अशोक सर पीसीआर में मौजूद हैं।
क़रीब पौने दो साल बाद मैंने ईटीवी छोड़ दिया। लोकसभा टीवी ज्वाईन करने के बाद कभी कभी बात हो जाती धीरे धीरे वो भी बंद होता गया। फिर पता चला कि वो वीओआई ज्वाइन करने वाले हैं। नौकरी के लालच में मैंने भी फोन किया, आख़िर सीनियर प्रोड्यूसर थे वो। लेकिन उनका स्नेह बरक़रार था। दिल्ली में कभी उनसे मिल नहीं पाया अपने पहले औपचारिक बाॅस से....अब भी कभी मिल भी नहीं पाउंगा। उनकी मौत नहीं होनी चाहिए थी...ना मैं मानने को तैयार नहीं...उन्हें अभी काफी ओमप्रकाशों की ज़रुरत है। ये सीखने की कि कैसे चुपचाप बेहतर काम हो सकता है। उनकी मौत मीडिया की कार्यशैली पर भी सवाल उठाती है....अशोक सर, आपको नहीं जाना चाहिए था। लोग आपको देखकर आप जैसा बनना चाहते थे, लेकिन आपकी इस तरह से मौत किसी को आपकी तरह होने से रोकेगी।

गुरुवार, १५ अक्तूबर २००९

शुभकामनाएं


शनिवार, २९ अगस्त २००९

जिन्ना ने कहा था...

[1940]
मुस्लिम लीग के एक सम्मेलन में जिन्ना ने कहा...
...ज्यादातर ये पाया गया है कि उनके (हिंदुओं के) जो नायक हैं वे मुसलमानों के दुश्मन हैं...ऐसी दो कौमों को, जिनमें से एक अल्पसंख्यक है और दूसरा बहुसंख्यक, एक देश में बांध देने से असंतोष बढ़ेगा और उस देश के लिए बनाई जाने वाली सरकार का तानाबाना अंतत: टूट जाएगा।
[ अगस्त, 1944]
जिन्ना ने मुस्लिम छात्रों को संबोधित करते हुए कहा...
...पाकिस्तान बन जाने से हिंदू मुसलमान खुश होंगे, क्योंकि ये उनके हित में यहीं ठीक रहेगा। वे कभी भी किसी को भी, चाहे वह अफगान हो या पठान मनमानी नहीं करने देंगे, क्योंकि भारत भारतीयों के लिए है।
[11 अगस्त, 1947]
जिन्ना ने कहा...
...यदि पाकिस्तान विभिन्न देशों के अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अपनी कोई जगह बनाना चाहता है तो उसे संप्रदाय और मज़हब से ऊपर उठना होगा। आप आज़ाद हैं, आप अपने मंदिरों में जाने के लिए आज़ाद हैं। आप अपनी मस्ज़िदों या दूसरे पूजा स्थलों पर जाने को आज़ाद हैं। आप किसी भी मज़हब, जाति, नस्ल से ताल्लुक रखते हैं, सरकार के कामकाज से उसका कोई सरोकार नहीं होगा।
एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने जिन्ना के बारे में कहा...
...वे सच्चे गुणों से बने हैं और तमाम सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं, यह उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे अच्छा राजदूत बनाता है।

.......इन बयानों के ज़रिए मैं कोई विश्लेषण नहीं कर रहा। बल्कि, बहस को समझने की कोशिश कर रहा हूं और सबसे पूछ रहा हूं कि जो अस्पष्टता ये बयान पेश करते हैं वही क्या समस्या की जड़ है। जिन्ना सांप्रदायिक थे या धर्मनिरपेक्ष या कुछ और...आप क्या कहते हैं।
(जिन्ना के ऊपर लिखे बयान मैंने अलग अलग पत्रिकाओं से लिए हैं।)

शुक्रवार, २१ अगस्त २००९

"नाखून क्यों बढ़ते हैं"

कल दिल्ली में भारी बारिश हुई, इतनी कि.... कितने विशाल पेड़ और खम्भे भूमिशायी हो गए। सड़क पर जाम में फंसे फंसे बड़ी कोफ्त हो रही थी, समझ नहीं आ रहा था कि थोड़ी बूंदाबांदी हो या मूसलाधार बारिश सड़कें फट से जाम हो जाती हैं। चौराहों, गलियों, तिराहा सब जगह गाड़ियां फंसी हुई। हर कोई सबके ऊपर से निकल जाना चाहता था। ट्रैफिक सिगनल खराब तो थे ही। लेकिन बारिश ने जैसे मेरी ही तरह सबको गुस्से से भर दिया था। इतना गुस्सा कि मेरी दोपहिया, एक कार वाले से बस "छुआ" ही था कि वो उबल पड़ा मेरे ऊपर। यहां तक कि जाम खुलने के बाद भी अपनी गाड़ी मेरे आगे पीछे करता रहा जैसे वो मुझे मार देने को ऊतारु हो। मैं सोच रहा था कि इतने "छुने" की, पता नहीं मुझे कितनी बड़ी सज़ा देना चाहता है ये। मै डर भी गया कहीं न कहीं। गाड़ी के अंदर तीन मुसटंडे बार बार झांक रहे थे। वो बोल क्या रहे थे ये बताने की ज़रुरत नहीं। ऐसा मैंने कई बार दूसरे लोगों के साथ होते देखा था तो अफसोस होता था और सब की तरह लोगों के "सिविक सेंस" को गलियाता। लेकिन, कल मुझे हज़ारी प्रसाद द्विवेदी याद आ गए। ग्रैज्यूएशन के दौरान हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी का एक ललित निबंध पढ़ा था "नाखून क्यों बढ़ते हैं"। निबंध में एक बच्चा अपने पिता से पूछता है कि नाखून क्यों बढ़ते हैं। जवाब जो मुझे समझ में आया वो ये कि आदिम ज़माने में मनुष्य जब अपने हाथों शिकार करता था तो नाखून कई बार फाड़ने चीरने में बड़े काम आते थे। लेकिन मनुष्य धीरे धीरे सभ्य होता गया तब मनुष्य ने नाखूनों को भी नियंत्रण में रखना सीख लिया। यानी नाखून हमारी असभ्य व्यवहार का प्रतीक है जिसने हमें हज़ारों सालों की सीख के बाद नेल कटर से काटना यानी नियंत्रण में रखना सीख लिया है। लेकिन, ये बढ़ना आज भी बंद नहीं हुए हैं। नाखून तो बढ़ते रहते हैं...और अगर आप किसी सड़क जाम में फंसे हों तो फिर तो लगता है कि ये और तेज़ी से बढ़ते हैं। पता नहीं ये नाखून किसे, कब कितना नुकसान पहुंचा जाएं। ये और बात दिमाग में आई कि कहीं नाखून का संबंध हमारी दिमागी फितरत से तो नहीं। अगर ऐसा है, तो सप्ताह में एक दिन नहीं बल्कि हर रोज़ नाखून काटने पड़ेगें।......

गुरुवार, २० अगस्त २००९

अब किसकी बारी !

शंकर सिंह वाधेला, गोविंदाचार्य, उमा भारती, मदनलाल खुराना, कल्याण सिंह, बाबुलाल मरांडी.....जसवंत सिंह। इन सब नामों में क्या काॅमन है। यहीं कि इन्हें या तो पार्टी विद डिफरेंस ने या तो पार्टी के निकाल बाहर किया या फिर ये ख़ुद भाजपा को छोड़ चले। इस सूची में और कई नाम जोड़े जा सकते हैं, इसमें कोई शक नहीं। कई नाम इसमें वापस पार्टी में आए और फिर गए भी। जसवंत सिंह नया नाम हैं, आंखों में आंसू लिए पार्टी से निकाले जाने के बाद जब ये फौजी मीडिया से बात कर रहा था तो एक बार तो दिल भर आया। ख़ास बात जानने की क्या है, वो ये कि भाजपा को ये वरदान मिला है कि इस पार्टी से जो भी बाहर जाएगा या भेजा जाएगा वो ज़िंदा नहीं रहेगा...मतलब राजनीतिक तौर पर वो या तो हाशिए पर होगा या ख़त्म हो जाएगा। लेकिन, भाजपा को शाप ये है कि वो अपने पैर पर कुल्हाड़ी ज़रुर चालाएगा...और एक एक करके उसके महारथी गिरते जाएगें, नतीजा भाजपा गर्त और गर्त में गिरती चली जाएगी। मेरी नज़र तो इस पर है कि अगला नंबर किसका है। राजस्थान में वसुंधरा राजे ने विरोध का बिगुल बजा दिया है। राजस्थान में घमासान जारी है। जिन्ना की बात किए बगैर तो ये आलेख अधूरा है। जिन्ना का जिन्न पता नहीं उसी पार्टी को लपेटे में क्यों ले रहा है जो उसकी सबसे बड़ी विरोधी रही है। इसने न तो आडवाणी को छोड़ा और न अब जसवंत को। लेकिन, लाॅजिक की बात करें तो मान लें कि जसवंत ने जिन्ना को महापुरुष बताया तो उसके लिए 600 से ज्यादा पन्नों की दलील भी दी। लेकिन, आडवाणी ने तो सब बातें हवा हवाई की। लेकिन, किसको ज्यादा सज़ा मिली। एक आज भी पार्टी में शीर्ष पर विराजमान है वहीं दूसरा भाजपा का रावण घोषित हो चुका है। आडवाणी ने तो न सिर्फ पार्टी को बदनाम किया बल्की पार्टी कई बार हरवाया है। पार्टी को कन्फ्यूज़ भी किया है। पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती आज यही है कि वो आरएसएस की लाईन पर चलना चाहती है कि मध्य मार्ग अपनाने वाली पार्टी है। इस कन्फ्यूजन के सबसे बड़े जिम्मेदार आडवाणी ही हैं। इसकी सज़ा उन्हें तो अभी तक नहीं मिली लेकिन पार्टी ज़रुर भुगत रही है।

शुक्रवार, ३१ जुलाई २००९

बलुचिस्तान का सच!

--भाग एक--
दो साल पहले की बात है जब भारत के नौसेना प्रमुख ने बलुचिस्तान के ग्वादर में बन रहे बंदरगाह को लेकर एक बयान दिया। ये बयान था कि जिस तरह चीन इस बंदरगाह के निर्माण में मदद दे रहा है वो भारत के लिए रणनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण है। इसका सीधा अर्थ ये लगाया गया कि भारत को ये कतई ठीक नहीं लग रहा कि कराची के बाद पाकिस्तान एक और उसी तरह के बंदरगाह बनाने में लगा है। जिसमें चीन की एक बड़ी भूमिका है। यहां की स्थानीय बलूच आबादी भी इस बंदरगाह का भारी विरोध कर रही है। क्या भारत किसी तरह की रुची बलूचिस्तान में है। आज सवाल यही उठ रहा है। बलूचिस्तान से सीनेटर सनाउल्लाह बलूच का कहना था कि "हमसे ज्यादा तो परवेज़ मु्शर्रफ और इस्लामाबाद भारत के क़रीब हैं, हम तो काफी दूर हैं। हमारा संघर्ष हमारे लोगों का संघर्ष है। भारत के लिएो सबसे अच्छा मौका तो 1973 में था जब बलूचिस्तान की आज़ादी की मांग अपने चरम पर थी।" सवाल है कि भारत पर सवाल क्यों उठ रहे हैं। पाकिस्तान कहता है कि आफगानिस्तान में भारत के एक दर्जन से ज्यादा सूचना केंद्र हैं जो कई तरह के भ्रम फैला रहा है। नब्ज़ यहीं है। भारत की आफगानिस्तान में बढ़ती भूमिका को लेकर पाकिस्तान खुश नहीं। भारत ही ऐसा देश है जो आफगानिस्तान के विकास में न सिर्फ अपना पसीना और पैसा लगा रहा है बल्कि वो अपना ख़ून भी लगा रहा है। क्या ये भलमनसाहत हमेशा दूष्टता का शिकार होती रहेगी। पाकिस्तान क्यों नहीं अपने गिरेबानं में झांकता है। पंजाब और पंजाबी राजनीति के दबदबे ने बलूचों को कहीं का नहीं छोड़ा। आज ऊंगली भारत पर उठाना सुरॿित निकासी की तलाश तो नहीं। लेकिन, शर्म अल शेख की संयुक्त घोषणा पत्र परेशान तो करती है। लेकिन झूठ तो झूठ होता है। पाकिस्तान चिल्ला चिल्लाकर दावा कर रहा था कि बलुचिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर उसने भारत को डोज़ियर दिया है, लेकिन बाद में वो इससे नानुकूर करने लगा। बाद में अमेरिका के विशेष दूत रिचर्ड हाॅलब्रुक ने साफ किया कि ऐसा कोई डोज़ियर कभी दिया ही नहीं गया।...बाकि कहानी अगले पोस्ट में।