02 जून, 2009

मीडिया का फैशन !

पिछले दिनों एक हिंदी न्यूज़ चैनल पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का प्रवक्ता एंकर के सवालों को झेल रहा था। मुद्दा था अभिनेत्री रेखा को मिलने वाले एक पुरस्कार को लेकर मनसे का विरोध। मनसे का युवा प्रवक्ता किसी तरह अपने को सही साबित करने की कोशिश कर रहा था, तभी एंकर का दनदनाता सवाल आया कि आप क्यों रेखा के पीछे पड़े हैं महाराष्ट्र के विदर्भ जाकर आत्महत्या करने वाले किसानों के लिए कुछ क्यों नहीं करते। इससे पहले कि मनसे प्रवक्ता कोई जवाब दे पाता ब्रेक का समय हो चुका था। हालांकि पहली नज़र में मुझे एंकर का ये सवाल बिना संदर्भ का लगा लेकिन विदर्भ, किसानों की आत्महत्या, कालाहांडी में भूख मिटाने के लिए अपने दुधमुहे को बेचना। इस तरह की सामाजिक सरोकार वाले सवाल तथाकथित मुख्य धारा कि इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के लिए फैशन या कहें कि दिखावा बन गए हैं। क्योंकि ये टीआरपी दिला नहीं सकते। लेकिन क्या उस समाज में भी ये मुद्दा है या नहीं जहां से ये पैदा हुए हैं। आम चुनाव के सिलसिले में पिछले दिनों महाराष्ट्र के विदर्भ जाने का मौका मिला। इसी सामाजिक सरोकार का मारा मैं था सो बड़ा रोमांचित था कि उस इलाकें में स्टोरी की कोई कमी नहीं होगी जहां पिछले 4-5 सालों में साढ़े तीन हज़ार किसानों ने आत्महत्या की हो। अकोला, अमरावती, यवतमाल, बुलढाणा जैसे इलाकों के गांवों में गया किसानों की कहानियां ढूंढने, लेकिन आश्चर्य कि ये मुद्दा न तो चुनावों में था न ही लोगों के बीच। बुलढाणा के एक गांव चिखली गया जहां कई आत्महत्यायें हो चुकी थीं। मैंने कई गांव वाले से पूछा कि आत्महत्या मुद्दा क्यों नहीं है। जवाब मिला कि सारे उम्मीदवार तो अपने हैं मरने वाले भी अपने ही हैं तो मुद्दा कैसे बने, क्या ज़रुरत है मुद्दा बनाने की एक लाख मुआवज़ा मिलना था मिल गया। जब इसका मतलब ढूंढा तो पता चला कि ये इलाका कुन्बी मराठा समुदाय का है, जहां दोनों मुख्य उम्मीदवार उसी समुदाय के हैं, ज्यादातर मतदाता उसी समुदाय के तो सब अपने ही हैं। यानी मुद्दा ख़त्म। मुद्दा नहीं तो स्टोरी कैसे करुं।

28 मई, 2009

कांग्रेस को वोट क्यों !

चुनावों के सिलसिले में पिछले दिनों महाराष्‍ट्र के दौरे पर था। चुनाव परिणाम के दिन यानी 16 मई की शाम में शिवसेना के उद्धव ठाकरे से मुलाकात हुई। मतदाताओं ने मुंबई की सभी 6 सीटों से शिवसेना का सफाया कर दिया था। हर जगह कांग्रेस ही कांग्रेस छाई थी। उद्धव हैरान परेशान थे। उसने कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि जिस शहर में 26/11 हुआ हो वो भी कांग्रेस गठबंधन की सरकार रहते केंद्र में भी और राज्य में भी वहां लोग कांग्रेस को कैसे वोट दे सकते हैं। जिस तरह से मुंबई में आतंकी हमले के बाद मुंबई और देश के लोगों ने जबरदस्त गुस्सा ज़ाहिर किया था वो गुस्सा क्या ग़ायब हो गया। याद रखिए मुंबई में जिन लोगों ने Enough is Enough कहा था वही लोग 30 अप्रील को वोट देने भी न निकल सके। मुंबई में 1977 के बाद सबसे कम मतदान हुआ था। 50 फीसदी से भी कम। चुनावी विशलेषक कहते भी हैं कि जब मतदान कम होता है तो वो सत्ता के पाले में जाता है। हुआ भी यही। तो आख़िर उद्धव की चिंता का क्या जवाब है। लोगों ने क्यों कांग्रेस को वोट दिया। एक सीधा का जवाब ये हो सकता है कि आतंकी घटनाओं के लिए जनता ने कांग्रेस को तो ज़िम्मेदार नहीं माना। लेकिन आतंक से लड़ने के लिए मतदाताओं ने शिवसेना और भाजपा को भी विकल्प तो नहीं ही माना है। आप क्या सोचते हैं...

18 मार्च, 2009

विश्व बैंक की पसंद बिदेसिया !

Slumdog मिलनियर लगता है सचमुच फिरंगियों को पसंद आ गई है। अब तो विश्व बैंक भी इसे पसंद करने लगा है। ख़ैर, ये बात विस्तार से थोड़ी देर में। आपको शायद भोजपूरी साहित्यकार भिखारी ठाकुर के बिदेसिया की याद हो। कितने दर्द दिए बिदेसिया ने। कितने घर उजाड़े। बिहारियों की ही बात करें तो कभी वो दिल्ली में रिक्शा चलाते गालीयों पर गालियां खाते रहते हैं। कभी पंजाब के खेतों में मज़दूरी करते दिख जाते हैं। सुना है कश्मीर के उन इलाक़ों में जहां कोई जाने को तैयार नहीं होता वहां बिहारी मज़दूर सड़क बनाने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे में एक सरकारी योजना आई, नरेगा यानी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना। इस योजना की सफलता-असफलता और भ्रष्टाचार पर लंबी बहस हो सकती है। लेकिन, कई इलाक़ों में इसने अंतर तो पैदा किया है। पंजाब में मज़दूर खोजे नहीं मिल रहे हैं। राजस्थान, आंध्रप्रदेश, बिहार के कई इलाक़ों में रोटी के लिए अपना घर-दुआर न छोड़ना पड़े इसका विकल्प नरेगा ने तो दिया ही है। विश्व बैंक को ये बात अच्छी नहीं लगी। उनका कहना है कि गांव से शहर में लोगों का आना तरक्की की निशानी है। उन्हें शहरों में आने से रोकना नहीं चाहिए, इसलिए नरेगा जैसी योजनाएं भारत के आर्थिक विकास में बाधक हैं। मुझे लगता है, कि विश्व बैंक को शहरों में बढ़ते जा रहे स्लमों यानी झोपड़ पट्टियों और गंदे नालों से प्यार हो गया है। शायद इसलिए उन्हें फिल्म स्लमडाॅग मिलिनियर भी पसंद आई होगी। गांवों से शहरों में जितना पलायन उतने स्लम। जितने स्लम उतनी तरक्की। पता नहीं विश्व बैंक आगे क्या करेगी। शायद, भारत सरकार को कुछ फंड दे दें नरेगा रोकने के लिए।

17 मार्च, 2009

...अगला प्रधानमंत्री ?

क्या आपको लगता है कि आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। अगर आपको ऐसा लगता है तो मीडिया को धन्यवाद दीजिए। जोड़-तोड़ जारी है, प्रधानमंत्री के इतने दावेदार कभी भी नहीं होगें जितने की इस बार हैं। चलिए, ये तो पुरानी बात है कुछ नया कहते हैं। कांग्रेस जानती है कि राहुल बाबा में दम नहीं है, चाहे वो कितनी रातें दलितों के घर बिता लें। राहुल गांधी अपने पापा की याद तो दिलाते हैं लेकिन वोट नहीं दिला पाते। मैडम सोनिया गांधी की तारिफ करनी होगी कि यूपीए अब तक चलती रही। लेकिन, वोटों और सीटों का क्या। वो बढ़ेगीं। बढ़े ना बढ़े घटेगीं ज़रुर, यो तो साफ है। मनमोहन सिंह किंग तो बने हैं लेकिन क्या देश ऐसे प्रधानमंत्री को आगे भी देखता रहेगा जो हमेशा ही बेचारे से लगते हैं। प्रियंका गांधी में दम है, वो दुर्गा दादी की याद भी दिलाती हैं, लेकिन पूरी तस्वीर में वो कहीं नहीं। ये कांग्रेस का दुर्भाग्य है। प्रणव दा भी हैं, लेकिन कोई चाह कर भी उनका नाम नहीं ले रहा। इतनी हिम्मत नहीं। चलिए, दूसरों की भी बात करें। आडवाणी ताल ठोक तो रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। गुजराती मोदी बड़े दावेदार हैं लेकिन कोई उनकी बात नहीं करता, हिम्मत ही नहीं। ये भाजपा का दुर्भाग्य है। दरअसल, हम सब मुंह चुराते रहते हैं सच से। कहते हैं कि शीर्ष पर हमेशा जगह खाली रहती हैं, दुर्भाग्य है कि ये भी सच है...मेरा भी मानना है कि अभी सवाल तो यही है कि प्रधानमंत्री अगला कौन होगा।...चलिए इंतज़ार करते हैं 16 मई का...

12 मार्च, 2009

Slumdog पर जागरुकता चाहिए...

पंचशील की लालबत्ती पर जैसे ही मैंने अपनी बाइक को ब्रेक लगाई कई स्लमिए बड़ी गाड़ियों जैसे इनोवा, टोयोटा पर लूझ पड़े। साफ कर दूं कि गंदे संदे छोटे बच्चों को एक एक रुपए मांगते देख अब सीधे स्लमडॉग मिलिनेयर की ही याद आती है। इसलिए इनको स्लमिए कह दिया। इन स्लमियों को देखकर बड़ा अफसोस भी हुआ। अरे, कहां तो स्लमडॉग को Oscar मिल गया, एक नहीं दो नहीं वो भी आठ, और ये नामुराद अब भी एक-एक रुपया मांग रहे हैं। अवेयरनेस की कमी है क्या करें। ख़ैर, लालबत्ती हरी हुई और आगे बढ़े, ऑफिस पहुंचा। Boos से मैने ऐसे ही पूछ लिया, सर आपने Slumdog..देखी क्या। उन्होंने बड़ा दार्शनिक जवाब दिया...हां देखी तो है लेकिन अलग अलग, स्लम अलग, डॉग अलग और मिलिनियर को अलग। क्या दर्शन है। लेकिन ये अलग अलग हम पहले भी देखते रहे हैं, पर डैनी बाॅयल ने इन सबको एक साथ कर दिया। दर्शन छोड़ो यथार्थ को जानों...इन स्लमियों की आदत जाएगी कब। क्यों नहीं ये भी कोई डायेरेक्टर को ढूंढते...विदेशी न सही देसी ही सही। या कोई अवेयरनेस कैंपेन चलाया जाए, कि एक एक रुपया छोड़ो और किसी रियलिटी शो पर नज़र रखो। मोबाइल तैयार रखो। दनादन एसएमएस करते रहो...किसी न किसी दिन कोई लतिका मिल ही जाएगी...मेरा मतलब है लतिका के साथ तो करोड़ों तो आएगें ही।

23 दिसंबर, 2008

निशान-ए-जुत्ता

निशाना लगे न लगे लेकिन ज़ख्म तो हो ही जाता है, चोट तो लग ही जाती है। क्या करें जूता तो चीज ही ऐसी है। मुंतज़ीर अल ज़ैदी का जूता भी कुछ अलग नहीं था। अफवाह तो ये भी है कि श्रीमान ज़ैदी पिछले कई दिनों से जूता निशाने पर मारने की प्रैक्टिस कर रहे थे। लेकिन लगता है उन्होंने मन लगा कर क्रिकेट नहीं खेली। अगर खेली भी तो गुरु ग्रेग जैसा कोच नहीं मिला होगा। ख़ैर, जूता तो निशाने पर नहीं लगा, लेकिन दाद देनी होगी महामहीम बुश की। इतने फुर्तीले। कानों के पास गुज़रते गुज़रते बुश साहब ने ये भी देख लिया कि जूता 10 नंबरी है। यानी, आंखें भी शरीर जितनी चपल।
अब निशाने का क्या है। लगी, लगी नहीं लगी। बात दरअसल में ये है कि जब अमेरिका का सुरक्षा विभाग पेंटागन में इराक़ पर हमला करने की योजना बना रहा था तो एक सूची बनाई गई। सूची में सबसे ऊपर उन ठिकानों का ज़िक्र था जिन पर सबसे पहले अमेरिकी बमबाज़ों को ढाहना था। सूची के अंत में इराक़ी तेल के कूएं, वहां का मशहूर संग्रहालय, अस्पताल, रिहाइशी इलाक़े वैगरह शामिल थे। लेकिन, जब अमेरिकी एफ-16 गरजे तो सबसे पहले निशाने वही इमारतें थीं जिन्हें या तो निशाना नहीं बनाना था या फिर अंत में काफी मुश्किल परिस्थितियों में नेस्तेनाबूद करना था। लेकिन हुआ बिलकुल उलटा। क्या करें हो सकता है निशाना न लगा हो। या हो सकता है कि अमेरिकी पायलटों ने हड़बड़ी में सूची उलटी पकड़ ली हो। अब क्या करें बड़े बड़े लक्ष्य को पाने के लिए छोटी मोटी क़ुर्बानियां तो देनी ही पड़ती हैं।

19 दिसंबर, 2008

ख़ुशी है या ग़म

अभी गुरुवार की ही बात है। लोकसभा में आर्थिक हालत पर हो रही चर्चा का जवाब देते हुए पी.चिदंबरम ने साफ किया कि मौजूदा विकास दर 7 फीसदी रहेगी। जो अभी हाल तक साढ़े सात फीसदी तक बताई जा रही थी। ऐसे में अचानक ही उम्मीद की कई किरणें दिखने लगी हैं। पिछले 6 सफ्ताह से कम होते होते महंगाई 7 फीसदी से भी कम पर आ गई। लगातार गिर रहा रुपया भी ड़ेढ़ महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। दूसरी तरफ शेयर बाजार भी पीछे नहीं रहा। पांच सप्ताह में बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स एक बार फिर से 10 हज़ार के आंकड़े के आसपास है। पिछले जुलाई में ही आठ आठ आंसू रुलाने वाला तेल की कीमतें पिछले चार सालों में सबसे निचले स्तर पर आ गया है। पिछले दिनों ही होम लोन में भी कमी की गई है। वहीं सरकार ने भी 30 हज़ार करोड़ से भी ज्यादा का पैकेज दिया है। एक्साईज ड्यूटी यानी उत्पाद करों में भी 4 फीसदी कमी की गई है। कारों और मोटरसाइकलों की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई है। यानी ख़ुश होने के कई मौके़। लेकिन ज़रा रुकिए। याद रखिए कि पिछले 5 सालों में पहली बार भारत की निर्यात बढ़ने की रफ्तार निगेटिव हो गई है। पिछले अक्टूबर में निर्यात 15 फीसदी तक घट गया। अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के देशों में मंदी पैदा होने से भारत के निर्यात कारोबार पर असर अब साफ दिख रहा है। क्योंकि जीडीपी में सामानों के निर्यात की हिस्सेदारी 17 फीसदी तक है। रुपए की कीमत भी इस साल 22 फीसदी कम हुई है। सरकार का ही एक सर्वेक्षण ये बताता है कि पिछले अगस्त से अक्टूबर तक मंदी के असर ने 65 हज़ार से भी ज्यादा नौकरियां छीन ली हैं।
दूसरी तरफ सरकार को घाटे की भी चिंता है। 70 हज़ार करोड़ से भी ज्यादा का किसान कर्ज माफी, छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करना उद्योगों को लगातार कई तरह के कर छूट ने सरकारी ख़जाने पर बड़ा असर डाला है। नतीजा, राजस्व और राजकोषिय घाटा नियंत्रण से बाहर ही जा रहे हैं। यानी रास्ते में सिर्फ खुशियों के फूल ही नहीं।